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महिला युग- आधुनिक कविता

 महिला युग- आधुनिक कविता  कभी आंगन में कभी रसोई में और कभी पास-पड़ोस में किसी चिड़ीयां की तरह चहचहाती थी जो वह कोमलांगी आज क्यों मौन है? पंख कुतर गया कोई उसके घायल अवस्था में फेंक गया वह शिकारी कौन है? स्त्री से जन्मा फिर उसे ही भोगा पागलों की तरह नोंचा-खसोटा जगंली जानवरों जैसा वह अपराधी कौन है? औरत की सुन्दरता पर मरने वाला अब मारता-पीटता क्यों उसे? जिसे अपनाने के लिए दुनियां से लड़ बैठा वह पुरूष अब उस औरत मात्र से लड़ता क्यों है? प्रेम रस में डुबी बातें कहां है अब? कहां गया शेरों-शायरी से प्रियतमा को लुभाने वाला वह कलाकार? चांद-तारें तोड़कर लाने वाला यह वही पुरूष है जिसने औरत के हर सपनों को पैरो तले रौंद दिया उसे चाहर दीवारी में कैद करने वाला पुरुष रूपी जेलर है जहां हर रोज महिला को फांसी दी जाती वह जल्लाद यही है जो आँखों पर काली पट्टी बांधकर स्त्री को दुनियां देखने की मनाही का आदेश देता है। कजरारी आंखों के नीचे कालिख और चेहरे की सूजन सबकुछ बयां कर जाती आदमी पर अमिट विश्वास का फल भोगती वह नारी! अब नहीं सहना चाहती शोषण और अत्याचार! कौन मुक्त करेगा इस व्याभिचार से इसे? वह और कोई...